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अच्युत

Posted On: 30 Mar, 2017 कविता में

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तुम अच्युत
मैं चंचल श्वांस |
तुम विमल कमल
मैं भ्रांति |
तुम वर्षों के विछड़े वियोग
मैं योग खोजती पंथी |
तुम निश्छल तप के सिद्ध राग
मैं मृदु मानस का सहज भाग |
तुम हो निधिवन की शीतल शाख
मैं छाँव खोजती विकल पांख |
तुम प्राणों के झंकृत सितार
मैं व्याकुल विरही तान |
तुम हो जीवन के सरसिज पथ
मैं जीवन पथ की रेणु |
तुम हो राधा के मुरलीधर
मैं बाट जोह्ती यमुना नीर |
तुम दुस्तर भवसागर कुशल
मैं तरने की अभिलाष |
तुम पौरुष के पुरुषोत्तम हो
मैं याचक प्रेम अधीर |
तुम चित्रकार ब्रम्हांड पटल
मैं क्षणिक तूलिका तेरी |
मेरी कविता के यश हो तुम
मैं तो हूँ मंद समीर |
मैं तो हूँ मंद समीर ||

अच्युत _ शकुन्तला मिश्रा

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sinsera के द्वारा
April 3, 2017

बड़े ही गूढ़ भाव लिए कविता है आदरणीय शकुंतला जी. भावों को कविता में सजा लेना भी एक कमाल ही है जो आपने बखूबी पूरा किया.

    shakuntlamishra के द्वारा
    April 7, 2017

    संसीरा जी आपके प्रोत्साहन से ख़ुश हूँ ।आपके लेख मुझे बहुत भाते है

Shobha के द्वारा
March 31, 2017

प्रिय शकुन्तला जी कविता भावुक हृदय से निकलती हैं मैं कभी दो लाईनें नहीं लिख सकी लेकिन भाव समझने की क्षमता है मुझमें आप की पंक्तियाँ सोचने पर विवश करती हैं |

    shakuntlamishra के द्वारा
    April 7, 2017

    शोभा जी आप तो प्राय:रोज़ लिखती है इस समय मैं ही कम आ रही हूँ ब्लाग पर आपको अपनी बड़ी बहन मानती हूँ । आपने प्रोत्साहित किया बहुत अच्छा लगा


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