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होली

Posted On 18 Feb, 2017 कविता में

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अहा ! देखो जल ही गई होलिका
जली है ,जलेगी कुटिल होलिका
अहा ! देखो उड़ने लगी है अबीर
दिवा -रात है सप्तरंगी लकीर ।
ख़ुशी आज गायेगी जोशे धमार
सुनो मित्र मेरे ,क़लम की पुकार
मसि आज बोलेगी जादू ज़ुबान
खड़े हो मेरे देश के नवजवान ।
मनाएँगे अबके बरस ऐसी होली
कि रौशन हो सपने खिले सबकी होली
उड़ाएँगे रंगो का …हम ऐसा रेला
रुके चाँद पे जाके रंगो का रेला
विभा रंग की आज ऐसी उड़ेगी
कि कुमकुम औ केसर सबको लगेगी
पढ़ो सामने के अक्षर ..क्या कहते
बन्द हुए गर सब दरवाज़े तब भी होली है
प्रकृति उड़ाए इत्र न तुम बच पाओगे
नाम है हो -ली प्रखर रंग है
कैसे तुम बच जाओगे ?
कैसे तुम बच जाओगे ??

शकुन्तला मिश्रा

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
February 19, 2017

प्रिय शकुंतला जी आप काफी समय बाद ब्लॉग पर होली के कथानक पर खूबसूरत रचना लेकर आयीं अति सुंदर

    shakuntlamishra के द्वारा
    February 19, 2017

    आभार आपका । आपने प्रोत्साहन दिया शोभा जी ।

    shakuntlamishra के द्वारा
    April 7, 2017

    आपने उत्साह वर्धन किया मैं ख़ुश हूँ अगर कही कमी लगे तो उसे भी कहे । मैं लेट हूँ क्षमा चाहती हूँ


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