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परम्परा

Posted On 9 Jul, 2016 कविता में

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परम्परा जीवन है
जीवन दायक है
जो कुछ बचा ध्वंस से
रखने लायक है |
घाट बाँध कर
गहरे पैठो
चलने दो संघर्ष
ब्यर्थ, जल जाने दो
लेकिन कच्ची ,हरी डाल
संरक्षित कर लो |
लुप्त न हो जाये कुछ ऐसा
पा न सकें जिसको हम वैसा
बात मान लो !!
परम्परा टूटी तो
नींद न आएगी ||
जड़ से छूट गए तो बोलो
और कहाँ जा पाओगे ??
परम्परा का स्वाद चखो तो
बड़ा नशा है
कल न पड़ेगी
बिना चखे मर जाओगे
अपनी मिट्टी,अपना मधुरस
ऐसा है की -
याद रखोगे ,याद रखोगे ||

शकुन्तला मिश्रा-



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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
September 22, 2016

अनमोल संदेश देती हुई और मन के कई कोनों को छूती हुई सुंदर कविता है यह आदरणीया शकुंतला जी । इस कविता को पढ़कर मुझे एक बहुत पुराना शेर याद आ गया - ’अपने पुरखों की विरासत को संभालो वरना अगली बारिश में ये दीवार भी गिर जाएगी’ ।

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
July 13, 2016

शकुंतला जी सुन्दर ,शायद अंग्रेज़ इस कविता को पढ़ें तो गदगद हो जायेंगे क्यों की वे परंपरा मैं ही जीते हैं |उनका संविधान ही परम्पराओं पर जीवित है | ओम शांति शांति तो परंपरा मैं ही मिलती है |

    shakuntlamishra के द्वारा
    August 9, 2016

     ॐ शांति || आभार

achyutamkeshvam के द्वारा
July 13, 2016

बहुत अच्छी कविता ,बधाई .

    shakuntlamishra के द्वारा
    August 9, 2016

     अच्छा  || आभार

Shobha के द्वारा
July 13, 2016

प्रिय शकुन्तला जी बहुत सौफ्ट प्यारी कविता

    shakuntlamishra के द्वारा
    August 9, 2016

    उत्साह वर्धन हुआ |

vikaskumar के द्वारा
July 9, 2016

सुन्दर कविता .

shakuntlamishra के द्वारा
July 9, 2016

नमस्कार !


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