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चहकते हैं नयनों में प्राण

Posted On 19 Apr, 2016 कविता में

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चहकते हैं नयनों में प्राण
कौन गाये अब दुःख के गान ?
है श्वासों में द्रुत ,
झंकृत तार |
ह्रदय के वर्ण
,
अविनश्वर आज |
रे चिरकालिक
के संचित ज्ञान
बता जीवन है कैसी प्यास ?
है अवगाहित जीवन की ज्योत

निर्मल कलकल में बंधा विश्व |
हैं वर्ण चमत्कृत ,मन -स्वर -तार |
कौन गाये अब दुःख के गान ?

शकुन्तला मिश्रा -चहकते हैं नयनों में प्राण



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
August 31, 2016

अति सुंदर ! प्रशंसनीय ! मनन योग्य ! अभिनंदन शकुंतला जी आपका इस कविता के लिए ।

    shakuntlamishra के द्वारा
    September 22, 2016

    आपने मेरा उत्साह वर्धन किया आभारी हूँ जितेन्द्र जी

vikaskumar के द्वारा
April 23, 2016

तत्सम शब्दावली से युक्त सुन्दर कविता . कविता में शास्त्रीय परम्पराओं का निर्वाह .

    shakuntlamishra के द्वारा
    April 23, 2016

    vikas कुमार जी ,धन्यवाद हम एक दूसरे को प्रोत्साहन दे बहुत अच्छा लगता है आभारी हूँ

sadguruji के द्वारा
April 23, 2016

रे चिरकालिक के संचित ज्ञान बता जीवन है कैसी प्यास ? आदरणीया शकुन्तला मिश्रा जी ! अति सुन्दर और गहरे भाव लिए इस अनुपम काव्य रचना के लिए बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई ! अच्छी प्रस्तुति हेतु सादर आभार !

    shakuntlamishra के द्वारा
    April 23, 2016

    प्रणाम गुरुदेव ! आपके लेख हमेशा विशेष होते है | आपने पढ़ा मुझे ख़ुशी है आभारी हूँ

arungupta के द्वारा
April 19, 2016

सुन्दर रचना

    shakuntlamishra के द्वारा
    April 22, 2016

    Aabhar Anurag ji


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