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अम्बर पे चाँद

Posted On: 31 Jan, 2016 Others,कविता में

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अम्बर पे चाँद बड़ा खुश था
बोला तू रोज सपने बुनती है !
स्वप्न तो बुलबुले होतें हैं ,
लहरों का छलावा आये और गये !
मैं सदियों से देख रहा हूँ
इंसान की ये फितरत !
सुनो चाँद !!
खुद को निहारो
रोज रूप बदलते हो
हम वैष्णव हैं
उस विष्णु की संतान
जिसमे कोटि चन्द्र समाये हैं
क्या तुम नहीं जानते ?
हम पुरुषार्थ से स्वप्न को गलाकर
अपने घर की नीव भरतें हैं
स्वप्न को सच बनातें हैं

shakuntla मिश्रा -



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pkdubey के द्वारा
February 2, 2016

हम पुरुषार्थ से स्वप्न को गलाकर अपने घर की नीव भरतें हैं| -आज की पीढ़ी को यह जानने की महती आवश्यकता है |

    shakuntlamishra के द्वारा
    April 19, 2016

    धन्यवाद !


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