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शरद पूर्णिमा

Posted On: 4 Nov, 2015 Others,कविता में

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रुद्ध है आराधन का द्वार
सफल होगा कैसे आह्वान
मेरे उर का यह सिंधु अथाह
जग दी फिर दर्शन की चाह !
कौन रोकेगा मेरी चाह ?
ह्रदय में चलने दो यह राग
एक पल को तो जागे भाग
वेदना में भी जीवन आग
तपूंगी मैं पीड़ा के बीच
मिटाये कौन मेरा एकांत ?
वेदना के सन्मुख है पर्व
मुझे दारुण दुःख देता आज
आज है महारास की रात
आज करना है कल्मष दाह
देवता भी देखंगे आज
पूर्ण होंगे सबके अरमान
चांदनी थिरक रही मधुवन
जले हैं अम्बर दीप अनंत
चीर कर आज निशा का अंध
चाँद भी उतरा धरती मध्य
उभर आया है आज ये मन्त्र
हो गया जीव आत्म निस्पंद

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shakuntlamishra के द्वारा
November 15, 2016

धन्यवाद यमुना जी उत्साह वर्धन करने के लिए ।

shakuntlamishra के द्वारा
November 15, 2016

बहुत बहुत धन्यवाद

Jitendra Mathur के द्वारा
September 22, 2016

भावोद्वेलित कर देने वाली सुंदर कविता है है यह आपकी । संभवतः चतुर्थ पंक्ति में ‘जग’ के स्थान पर ‘जगा’ शब्द होना चाहिए । कृपया पुनरावलोकन कर लें ।


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