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एक था मन

Posted On: 13 Jun, 2015 Others,कविता में

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देखना चाहूँ सब संसार ,
प्राणो को प्लावित कर अपार !
सब काल वहन कर लूँ खुद पर ,
तैर कर जा पहुंचूं उस पार !
करुणा की धार बहाऊंगी ,
पाषाण की कारा तोड़ूँगी !
फूलों की गंध वसा लूंगी ,
रवि की किरणों पर दौडूँगी !
शिखर -शिखर को चूमूंगी ,
सॉरी वसुंधरा डोलूँगी !
निज ह्रदय की बातें कह दूँगी ,
हर प्राण गान में मैं हूँगी !
इतना सुख साध मेरे मन में ,
तारे जितने नभ मंडल में !
सब गूँथूँगी इक माला में ,
यौवन सा वेग है प्राणो में ,
आशा असीम है इस मन में ,
भावों के गीत भरे मन में !!

एक था मन -शकुंतला मिश्रा



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
September 22, 2016

अभिभूत हो गया हूँ इस कविता को पढ़कर । प्रशंसा के लिए उचित शब्द नहीं मिल रहे हैं । असीम अभिनंदन आपका ।

Santlal Karun के द्वारा
June 17, 2015

आदरणीया मैडम, अति सुन्दर, भाव-भरी कविता– “इतना सुख साध मेरे मन में , तारे जितने नभ मंडल में ! सब गूँथूँगी इक माला में , यौवन सा वेग है प्राणो में , आशा असीम है इस मन में,” …किन्तु अंतिम पंक्ति एक बार फिर से देख लें | हार्दिक साधुवाद एवं सदभावनाएँ !

    shakuntlamishra के द्वारा
    June 22, 2015

    santlal ji , utsaah vardhan ke liye aapki abhari hoon


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