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पथिक

Posted On: 13 Apr, 2015 Others,कविता में

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पथिक कहाँ जाते हो ?
बताओ तो !
मुझ पर विश्वास करो !
मैं इसी श्रिष्टि का आदमी हूँ !
मैं यहाँ रहा हूँ ,अकेला बिना साथी के !

मेरी आँखों में आवेश है तड़प का ,स्वप्न का ,भूख का !
जब मैं यहाँ आया ,मा ने मुझे वाँसुरी दी थी !
बहुत दिन तक मैं उसे एकांत में बजता रहा ,
मैंने स्वर सीख लिया “क्लीं” निकाला !
मृत्यु को जीत कर कर्म हीन जीवन को तरंग दिया
!
इस महा गीत से सैकड़ो का असंतोष मिट गया !
इस वृहद संसार के दुःख को मिटाता गया !
अपने दुःख सुख ,स्वार्थ से खुद को बचाता गया !

pathik  shakuntla mishra



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
April 15, 2015

आदरणीया शकुंतला मिश्रा जी ! विचारणीय और मौलिक कृति के लिए बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई ! ये कविता मुझे आपके जीवन का जिया हुआ अनुभव और सार लगी ! बहुत अच्छी रचना ! ये पंक्तिया मन को छू लेने वाली हैं ! मेरी आँखों में आवेश है तड़प का ,स्वप्न का ,भूख का ! जब मैं यहाँ आया ,मा ने मुझे वाँसुरी दी थी ! बहुत दिन तक मैं उसे एकांत में बजता रहा , मैंने स्वर सीख लिया “क्लीं” निकाला ! मृत्यु को जीत कर कर्म हीन जीवन को तरंग दिया !

    shakuntlamishra के द्वारा
    April 17, 2015

    नमन !! जी सही पहचाना गुरु जी आपने ! मुकम्मल जहां की तलाश जारी है ! आदर सहित नमन !!


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